प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित चिन्मय अमृत महोत्सव वैश्विक सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में शामिल हुए। इस दौरान आधुनिक तकनीक के जरिए स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती के होलोग्राम स्वरूप को देखकर प्रधानमंत्री भावुक हो गए। उन्होंने वर्ष 1993 में स्वामी जी से हुई अपनी आखिरी मुलाकात को याद किया और कहा कि ऐसा लगा मानो वे 33 साल पीछे लौट गए हों।
यह तीन दिवसीय सम्मेलन 23 से 25 अक्टूबर तक आयोजित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य चिन्मय मिशन के 75 वर्षों की आध्यात्मिक और सामाजिक यात्रा को याद करना है। देश-विदेश से 9,000 से अधिक प्रतिनिधि इस सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं, जो चिन्मय मिशन की स्थापना के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में साल भर से चले आ रहे कार्यक्रमों का समापन समारोह है।
होलोग्राम से संवाद: भारत तुम्हारे साथ है, नरेंद्र
समारोह के दौरान होलोग्राम तकनीक के माध्यम से स्वामी चिन्मयानंद के दर्शन और उनके साथ संवाद का अनुभव करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने इसे अपने लिए अत्यंत भावुक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि वडोदरा में 1993 में हुई गुरुदेव के साथ उनकी मुलाकात, उनका स्नेह और मार्गदर्शन आज भी उनकी स्मृतियों में तरोताजा है।
होलोग्राम संवाद के दौरान प्रधानमंत्री ने अपने भविष्य के कार्यों के लिए आध्यात्मिक गुरु का आशीर्वाद मांगा। उन्होंने कहा कि उनका सौभाग्य था कि वे स्वामी जी से मिले थे और अब वे चाहते हैं कि गुरुदेव उनके भावी कार्यों के लिए उन्हें आशीर्वाद दें। जवाब में स्वामी चिन्मयानंद के होलोग्राम स्वरूप ने उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में देखकर खुशी जताई और अपना समर्थन देते हुए कहा कि भारत तुम्हारे साथ है, नरेंद्र।
प्रधानमंत्री ने कहा कि एक पल के लिए उन्हें ऐसा लगा जैसे वे उसी समय में वापस चले गए हों। उन्होंने इस कार्यक्रम के आयोजन के लिए चिन्मय मिशन का धन्यवाद दिया और कहा कि यह उनके लिए एक भावुक पल है।
1993 की वह मुलाकात जो बन गई यादगार
प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि फरवरी या मार्च 1993 में उनकी स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती से मुलाकात हुई थी। उस समय उन्होंने स्वामी जी को अमेरिका के शिकागो में आयोजित होने वाली विश्व धर्म संसद की शताब्दी से जुड़े कार्यक्रम में शामिल होने का निमंत्रण दिया था। यह कार्यक्रम स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक शिकागो संबोधन के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित किया जा रहा था।
स्वामी चिन्मयानंद ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया था और अमेरिका में कई कार्यक्रमों के जरिए शताब्दी समारोह के प्रति जागरूकता भी फैलाई थी। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। कार्यक्रम से कुछ सप्ताह पहले 3 अगस्त 1993 को अमेरिका के सैन डिएगो में उनका निधन हो गया। 11 सितंबर 1993 को शिकागो में हुए कार्यक्रम में उनकी कमी को गहराई से महसूस किया गया। प्रधानमंत्री के मुताबिक, उनकी स्वामी जी के साथ हुई अंतिम चर्चा का मुख्य केंद्र युवा शक्ति का निर्माण और एक सक्षम राष्ट्र का विकास था।
कौन थे स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती
स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती का जन्म 8 मई 1916 को केरल के एर्नाकुलम में हुआ था। संन्यास लेने से पहले उनका नाम बालकृष्ण मेनन था। उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और पत्रकारिता से भी जुड़े रहे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी उन्होंने भागीदारी की।
बाद में उन्होंने आध्यात्मिक मार्ग अपनाया और ऋषिकेश में स्वामी शिवानंद सरस्वती से दीक्षा ली। इसके बाद स्वामी तपोवन महाराज के मार्गदर्शन में उन्होंने वेदांत का गहन अध्ययन किया। वर्ष 1951 में स्वामी चिन्मयानंद ने चिन्मय मिशन की स्थापना की। इसका उद्देश्य वेदांत, उपनिषदों और भगवद्गीता के ज्ञान को आम लोगों तक पहुंचाना था।
समय के साथ चिन्मय मिशन ने भारत सहित कई देशों में अपनी गतिविधियों का विस्तार किया। संस्था आध्यात्मिक शिक्षा, गीता अध्ययन, युवाओं के प्रशिक्षण और सामाजिक सेवा से जुड़े कार्यक्रम संचालित करती है।
चिन्मय मिशन के 75 वर्ष: आध्यात्मिक यात्रा का उत्सव
यह वैश्विक सम्मेलन चिन्मय मिशन के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में साल भर से चले आ रहे कार्यक्रमों का समापन है। इस दौरान कई बड़े आयोजन हुए, जिनमें देश के विभिन्न हिस्सों में हवन, मंदिरों की प्राण प्रतिष्ठा, गीता पाठ और गीता का संदेश फैलाने के लिए 15 नौजवानों की 40,000 किलोमीटर से ज्यादा की यात्रा शामिल रही।
- तीन दिवसीय सम्मेलन 23 से 25 अक्टूबर तक भारत मंडपम में आयोजित।
- देश-विदेश से 9,000 से अधिक प्रतिनिधि ले रहे हैं हिस्सा।
- चिन्मय मिशन की स्थापना 1951 में स्वामी चिन्मयानंद ने की थी।
- साल भर के उत्सव में हवन, गीता पाठ और 40,000 किलोमीटर की युवा यात्रा।
चिन्मय विचार: सिर्फ संस्था नहीं, एक अमर दर्शन
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि चिन्मय मिशन केवल एक संस्था नहीं है, बल्कि यह चिन्मय विचार का प्रतिनिधित्व करता है। चिन्मय शब्द अमरता का प्रतीक है, जिससे भारत मंडपम में आयोजित चिन्मय अमृत महोत्सव का नाम और भी अर्थपूर्ण हो जाता है।
युवाओं को राष्ट्र निर्माण से जुड़ने का आह्वान
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में स्वामी चिन्मयानंद की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका जीवन राष्ट्र, संस्कृति और आध्यात्मिक ज्ञान के प्रसार के लिए समर्पित था। उन्होंने युवाओं से व्यक्तिगत विकास को राष्ट्र निर्माण से जोड़ने का आह्वान किया। प्रधानमंत्री के अनुसार, युवाओं की ऊर्जा और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का प्रसार देश के भविष्य को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
सम्मेलन में शामिल युवाओं के लिए प्रधानमंत्री का संदेश स्पष्ट था — अपनी नीतियों और कार्यों के केंद्र में युवाओं को रखें, क्योंकि मजबूत भारत के निर्माण में युवा शक्ति अहम है। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को 2047 तक विकसित भारत के विजन से जोड़ना होगा।
आध्यात्मिक परंपरा और समाज के लिए योगदान
चिन्मय अमृत महोत्सव वैश्विक सम्मेलन के जरिए स्वामी चिन्मयानंद की शिक्षाओं, भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और समाज में मिशन के योगदान को सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है। यह सम्मेलन वेदांत, भगवद्गीता के ज्ञान, सांस्कृतिक संरक्षण और सामुदायिक सेवा के क्षेत्र में मिशन के निरंतर कार्य का उत्सव है।
प्रधानमंत्री मोदी के लिए यह कार्यक्रम सिर्फ एक उद्घाटन समारोह नहीं, बल्कि 33 साल पुरानी स्मृतियों का भावनात्मक पुनर्मिलन था। गुरुदेव के आशीर्वाद और उनके आदर्शों के साथ आगे बढ़ने का संकल्प लेकर प्रधानमंत्री ने कहा कि स्वामी जी का स्नेह और मार्गदर्शन उनके राजनीतिक और प्रशासनिक जीवन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है।
