Wednesday, 21 October 2026

हेपेटाइटिस बी के मरीजों के लिए बड़ी राहत! अमेरिका ने नई दवा को दी मंजूरी, अब बंद हो सकेगी रोज की गोली

हेपेटाइटिस बी वायरस और लिवर को दिखाता मेडिकल चित्रण

क्रोनिक हेपेटाइटिस बी से जूझ रहे लाखों मरीजों के लिए एक उम्मीद भरी खबर सामने आई है। अमेरिका के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने मंगलवार को हेपेटाइटिस बी के एक नए इलाज को मंजूरी दे दी है। इस नए इलाज से कुछ मरीज वायरस को नियंत्रित रखते हुए अपनी रोज की एंटीवायरल दवाएं लेना बंद कर सकेंगे। अब तक इस बीमारी के ज्यादातर मरीजों को सालों-साल रोज दवाएं लेनी पड़ती थीं।

एफडीए ने ‘हिबसागो’ (बेपिरोविरसेन) नाम की इस दवा को मंजूरी दी है, जिसे जीएसके कंपनी ने विकसित किया है। यह इंजेक्शन के जरिए दी जाने वाली दवा है और हेपेटाइटिस बी के लिए एफडीए द्वारा स्वीकृत पहली ‘एंटीसेंस ओलिगोन्यूक्लियोटाइड’ है। चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि यह मंजूरी इस गंभीर बीमारी के इलाज की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

नई दवा कैसे काम करती है?

हिबसागो एक खास तकनीक पर आधारित है, जो उन जेनेटिक निर्देशों में बाधा डालती है, जिनकी मदद से हेपेटाइटिस बी वायरस अपनी संख्या बढ़ाता है और वायरल प्रोटीन बनाता है। आसान भाषा में कहें तो यह दवा वायरस के बढ़ने की प्रक्रिया को ही रोकने की कोशिश करती है।

अब तक के इलाज में एंटीवायरल दवाएं वायरस को दबाए रखती थीं, लेकिन जैसे ही दवा बंद होती थी, वायरस फिर से सक्रिय होने का खतरा रहता था। नई तकनीक का दावा है कि कुछ मरीजों में पूरा इलाज बंद करने के बाद भी वायरस पर लंबे समय तक नियंत्रण बना रह सकता है। हालांकि यह हर मरीज के साथ नहीं होगा, यह बात भी स्पष्ट की गई है।

क्लिनिकल ट्रायल के नतीजे क्या कहते हैं?

एफडीए के मुताबिक, इस इलाज का मूल्यांकन दो क्लिनिकल ट्रायल में किया गया, जिसमें हिबसागो की तुलना प्लेसबो से की गई। मरीजों को 24 सप्ताह तक इंजेक्शन दिए गए, और इस दौरान वे अपनी पहले से चल रही एंटीवायरल दवाएं भी लेते रहे। हिबसागो का आखिरी इंजेक्शन लगने के बाद भी मरीजों को कम से कम 24 सप्ताह तक अपना नियमित एंटीवायरल इलाज जारी रखना था।

उसके बाद कुछ प्रतिभागियों को एंटीवायरल दवाएं बंद करने की अनुमति दी गई, बशर्ते वे तय किए गए मेडिकल और लैबोरेटरी मानदंडों को पूरा करते हों। नतीजे उत्साहजनक रहे:

  • हिबसागो लेने वाले 24 प्रतिशत मरीज अपनी एंटीवायरल दवाएं बंद करने की शर्तों को पूरा करने में सफल रहे, जबकि प्लेसबो ग्रुप में ऐसा कोई भी मरीज नहीं था।
  • हेपेटाइटिस बी का सारा इलाज बंद करने के 24 हफ्तों बाद भी, हिबसागो लेने वाले 19 प्रतिशत मरीजों में वायरस पर नियंत्रण बना रहा और उनके खून में हेपेटाइटिस बी सरफेस एंटीजन का पता नहीं चला।

इन नतीजों से पता चलता है कि कुछ मरीजों में बिना लगातार इलाज के भी वायरस पर लंबे समय तक नियंत्रण बना रह सकता है, हालांकि ज्यादातर मरीजों के साथ ऐसा नहीं हुआ। यानी यह दवा किसी चमत्कारी इलाज का दावा नहीं करती, लेकिन चुनिंदा मरीजों के लिए यह जिंदगी बदलने वाली साबित हो सकती है।

किन मरीजों को मिलेगी यह दवा?

एफडीए ने यह मंजूरी सभी मरीजों के लिए नहीं, बल्कि खास शर्तें पूरी करने वाले वयस्क मरीजों के लिए दी है। जिन मरीजों को सिरोसिस (लिवर का गंभीर नुकसान) नहीं है, जिन्होंने कम से कम छह महीने तक एंटीवायरल थेरेपी ली है और जिनके खून में हेपेटाइटिस बी वायरस का स्तर दबा हुआ है, वे इसके पात्र हो सकते हैं।

इसके अलावा, एफडीए द्वारा अधिकृत डायग्नोस्टिक टेस्ट के जरिए यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि मरीज के शरीर में ‘हेपेटाइटिस बी सरफेस एंटीजन’ का स्तर 3,000 इंटरनेशनल यूनिट प्रति मिलीलीटर या उससे कम हो। एफडीए ने रोश कंपनी द्वारा विकसित एक डायग्नोस्टिक टेस्ट को भी मंजूरी दी है, जो सही मरीजों की पहचान करने और इलाज की निगरानी में मदद करेगा।

दवा के जोखिम और सावधानियां

एफडीए ने इस बात पर जोर दिया है कि इस दवा के साथ सुरक्षा से जुड़े गंभीर जोखिम हो सकते हैं। दवा की जानकारी में लिवर की गंभीर प्रतिक्रियाओं और प्लेटलेट काउंट में कमी के बारे में एक विशेष चेतावनी दी गई है। इससे जानलेवा ब्लीडिंग का खतरा बढ़ सकता है।

इसके अलावा, किडनी की कार्यक्षमता बिगड़ने, गंभीर सूजन (जैसे वैस्कुलिटिस) होने और दवा को गलत तरीके से दिए जाने से पैदा होने वाली जटिलताओं के बारे में भी चेतावनी दी गई है। इस दवा से इलाज कराने वाले मरीजों को थेरेपी शुरू करने से पहले और उसके दौरान नियमित रूप से ब्लड टेस्ट कराने होंगे और डॉक्टरों की निगरानी में रहना होगा।

लैब टेस्ट में आने वाली असामान्यताओं के अलावा, सबसे आम साइड इफेक्ट्स में इंजेक्शन वाली जगह पर प्रतिक्रिया, बुखार, थकान और सिरदर्द शामिल हैं। विशेषज्ञों की सलाह है कि कोई भी मरीज अपने डॉक्टर से सलाह लिए बिना अपना इलाज न बदले।

भारत के लिए इसका क्या मतलब है?

यह मंजूरी जीएसके पीएलसी को दी गई है और इसे ‘फास्ट ट्रैक’, ‘ब्रेकथ्रू थेरेपी’ और ‘प्रायोरिटी रिव्यू’ का दर्जा मिला है, जो बताता है कि एफडीए के अनुसार यह दवा एक महत्वपूर्ण मेडिकल जरूरत को पूरा करने की क्षमता रखती है। हालांकि, एफडीए की घोषणा में यह नहीं बताया गया है कि यह इलाज अमेरिका के बाहर, यानी भारत सहित अन्य देशों में कब से उपलब्ध होगा।

क्रोनिक हेपेटाइटिस बी एक लंबे समय तक चलने वाला वायरल संक्रमण है जो लिवर को प्रभावित करता है। भारत सहित पूरे एशिया में हेपेटाइटिस बी सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। यहां बीमारी को नियंत्रित करने के लिए रोकथाम, टीकाकरण, स्क्रीनिंग और इलाज तक पहुंच बहुत महत्वपूर्ण है।

एफडीए के ‘ऑफिस ऑफ इंफेक्शियस डिसीज’ की कार्यवाहक निदेशक वेंडी कार्टर ने कहा, “क्रोनिक हेपेटाइटिस बी से पीड़ित कई लोगों के लिए वायरस को दबाए रखने के लिए सालों तक एंटीवायरल दवाएं लेनी पड़ती हैं। हिबसागो इलाज का एक नया तरीका पेश करता है, जिससे कुछ मरीज पूरा इलाज खत्म होने के बाद भी वायरस को नियंत्रित रख सकते हैं। यह मंजूरी इस गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रगति है।”

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राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय घटनाएं, देश-राज्य की राजनीति और सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी खबरों पर लेखन। बिजनेस और स्पोर्ट्स की खबरें भी। ब्रेकिंग न्यूज की होड़ के बीच डिजिटल मीडिया में एआई जैसे नवाचार की नर्सरी का छात्र।