Sunday, 1 November 2026

कैंसर की दवाओं के दाम घटे, पर महंगी दवाओं पर राहत नहीं — अब अनिवार्य लाइसेंसिंग की मांग उठी

कैंसर की दवाओं की कीमतों पर चर्चा, अस्पताल में दवाएं

कैंसर की दवाओं की कीमतों को लेकर इस सप्ताह बड़ी राहत की खबर आई थी, लेकिन अब उसी फैसले की सीमाओं पर सवाल उठने लगे हैं। एनपीपीए के व्यापार मार्जिन सीमित करने के फैसले के बाद कई दवाओं के दामों में भारी कमी दर्ज की गई। कुछ दवाओं की कीमतों में नब्बे प्रतिशत से अधिक की गिरावट भी सामने आई। इसके बावजूद सबसे महंगी दवाओं की कीमतों में लगभग कोई बदलाव नहीं हुआ है। अब विशेषज्ञ पेटेंट कानून के रास्तों के इस्तेमाल की मांग कर रहे हैं।

पहले क्या हुआ था, और नई कीमतें कब से लागू होंगी

एनपीपीए ने सत्रह अक्टूबर को एक सौ सैंतीस गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं के व्यापार मार्जिन को युक्तिसंगत बनाने की घोषणा की थी। इसका मकसद अत्यधिक मार्जिन कम करना, इलाज को किफायती बनाना और दवाओं तक पहुंच सुधारना था। इसके बाद कंपनियों से मिली जानकारी के आधार पर संशोधित अधिकतम खुदरा मूल्य की सूची जारी की गई। नई कीमतें नौ नवंबर दो हजार छब्बीस से लागू होनी हैं। उस तारीख से अस्पतालों और दवा विक्रेताओं को संशोधित कीमतों पर ही दवाएं देनी होंगी। मरीज एनपीपीए की वेबसाइट से नई कीमतें जांच सकते हैं।

कितनी दवाओं के दाम घटे, कितनी पर कोई असर नहीं

एक विश्लेषण के अनुसार छह सौ तैंतालीस पैक की सूची में औसतन अड़तीस दशमलव दो दो प्रतिशत की कटौती हुई, लेकिन एक सौ उनसठ पैक की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ। यानी लगभग हर चार में से एक पैक की कीमत जस की तस बनी रही। कुछ रिपोर्टों में पांच सौ तैंतालीस ब्रांड और पैक का उल्लेख है, जिनमें से तीन सौ सत्तानबे की कीमतें घटाई गईं। बड़ी कटौती मुख्य रूप से कम कीमत वाली दवाओं में हुई है। एक लाख रुपये से अधिक कीमत वाले इक्यावन पैक में से केवल तीन में कटौती हुई, और उनमें से भी दो में कमी मामूली रही।

महंगी दवाओं के उदाहरण क्या बताते हैं

सैमटेपा इंजेक्शन की कीमत अस्सी हजार इकहत्तर रुपये से घटकर सात हजार एक सौ पचास रुपये हो गई। पैलबोप्रो के इक्कीस कैप्सूल वाले पैक की कीमत चालीस हजार चार सौ इक्कीस रुपये से घटकर दो हजार सात सौ बीस रुपये रह गई। आइसोजेन और बेवासिजैब में भी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। दूसरी ओर, कीट्रूडा इंजेक्शन की कीमत दो लाख सोलह हजार पांच सौ रुपये पर बनी रही। टैग्रीसो की कीमत चार लाख सोलह हजार रुपये और कोसेलुगो की कीमत दस लाख रुपये से अधिक बताई गई है। कोसेलुगो के साठ कैप्सूल वाले पैक की कीमत दस लाख इक्कीस हजार नौ सौ बानवे रुपये पर स्थिर रही। केवल टोरिपालिमैब ही एक लाख रुपये से नीचे आई। यही अंतर मरीजों के लिए सबसे बड़ी चिंता है।

एक ही दवा, दो कीमतें — जेनेरिक और मूल दवा का अंतर

एक ही दवा के अलग-अलग ब्रांडों की कीमतों में भारी अंतर बना हुआ है। एस्ट्राजेनेका की एनास्ट्रोजोल की कीमत तीन हजार पांच सौ इकतालीस रुपये पर बनी रही, जबकि सिप्ला का ब्रांड सात सौ चौरासी रुपये से घटकर एक सौ छियालीस रुपये हो गया। रोश की मूल दवा एवास्टिन की कीमत लगभग एक लाख तेईस हजार रुपये बनी रही, जबकि उसी दवा के अन्य संस्करण बारह हजार छह सौ अड़सठ रुपये और आठ हजार नौ सौ छप्पन रुपये में उपलब्ध बताए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जब सस्ता विकल्प मौजूद हो, तब मरीज तक उसकी जानकारी पहुंचना भी उतना ही जरूरी है, जितना कीमत घटाना। पारदर्शिता की मांग भी उठ रही है।

विशेषज्ञों की मांग — पेटेंट कानून और अस्पतालों के शुल्क पर सवाल

थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क के गोपालकुमार ने सरकार से पेटेंट अधिनियम की धारा बानवे और धारा सौ का इस्तेमाल करने की मांग की है, जहां उचित हो। धारा बानवे आपातकाल या सार्वजनिक गैर-वाणिज्यिक उपयोग में अनिवार्य लाइसेंस का प्रावधान करती है। धारा सौ सरकार को सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए पेटेंट वाले आविष्कार का उपयोग करने का अधिकार देती है। उनका तर्क है कि जब दवाएं वहन करने योग्य नहीं रहतीं, तो सरकार को पेटेंट की अवधि समाप्त होने का इंतजार नहीं करना चाहिए। व्यापार मार्जिन केवल एक हिस्सा है; इससे निर्माता की शुरुआती कीमत का समाधान नहीं होता। केरल हाईकोर्ट के फैसले में माना गया कि धारा सौ के तहत सरकार जन स्वास्थ्य के लिए पेटेंट दवाओं का निर्माण और जरूरतमंद मरीजों को गैर-वाणिज्यिक आपूर्ति कर सकती है। विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि दवा सस्ती होना ही काफी नहीं है। यदि अस्पताल सेवाओं के लिए अधिक शुल्क वसूलते रहें, तो इलाज की कुल लागत कम नहीं होगी। महंगी दवा पर तीस प्रतिशत मार्जिन की रकम सस्ती दवा से कहीं अधिक होती है, इसलिए अस्पतालों को महंगी दवा रखने का प्रोत्साहन मिल सकता है।

मरीजों के लिए आगे क्या मायने रखता है

  • नई कीमतें नौ नवंबर से लागू होंगी; खरीदारी से पहले संशोधित मूल्य सूची जांचें।
  • हर दवा की कीमत नहीं घटी है — डॉक्टर से विकल्पों और कुल इलाज खर्च पर बात करें।
  • दवा के साथ अस्पताल के शुल्क और जांच का पूरा अनुमान पहले से लें।
  • कोई दवा बदलने या बंद करने से पहले डॉक्टर की सलाह लें; खुद से दवा न बदलें।

कुल मिलाकर, यह कटौती कई परिवारों के लिए राहत है, पर सब तक समान रूप से नहीं पहुंची है। सबसे महंगी और पेटेंट वाली दवाएं अब भी अधिकांश मरीजों की पहुंच से बाहर हैं। यही कारण है कि बहस अब कीमत घटाने से आगे बढ़कर कानून, पारदर्शिता और अस्पतालों की भूमिका तक पहुंच गई है। नौ नवंबर से नई कीमतों का जमीनी असर बताएगा कि राहत मरीजों तक कितनी पहुंचती है। तब तक जानकारी जांचें और हर फैसला डॉक्टर की सलाह से लें।

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राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय घटनाएं, देश-राज्य की राजनीति और सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी खबरों पर लेखन। बिजनेस और स्पोर्ट्स की खबरें भी। ब्रेकिंग न्यूज की होड़ के बीच डिजिटल मीडिया में एआई जैसे नवाचार की नर्सरी का छात्र।