Friday, 23 October 2026

बचाव ही सबसे बड़ा इलाज: ABP Health Conclave में JP नड्डा ने पेश किया नया हेल्थ मॉडल

ABP Health Conclave में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा नया हेल्थ मॉडल पेश करते हुए

कहा जाता है कि इलाज से बेहतर बचाव होता है, लेकिन हकीकत यह है कि ज्यादातर लोग डॉक्टर के पास तभी जाते हैं जब बीमारी गंभीर हो चुकी होती है। देश की स्वास्थ्य व्यवस्था अब इस आदत को बदलने की दिशा में आगे बढ़ रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने ABP Health Conclave में प्रिवेंटिव हेल्थ और अर्ली डिटेक्शन पर आधारित नया हेल्थ मॉडल पेश किया है। मंत्री ने बताया कि साल 2017 से ही बचाव और समय पर पहचान को स्वास्थ्य नीति की प्राथमिकता बनाया गया है, ताकि बीमारी के गंभीर होने से पहले ही उसका पता लगाया जा सके और सही समय पर इलाज मिल सके।

नया हेल्थ मॉडल: बीमारी गंभीर होने से पहले ही पकड़ो

नए हेल्थ मॉडल की सबसे बड़ी खासियत है बीमारी की समय पर पहचान। कैंसर, डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियां अक्सर तब सामने आती हैं जब वे काफी बढ़ चुकी होती हैं। उस समय इलाज न सिर्फ महंगा होता है, बल्कि मरीज के बचने की संभावना भी कम हो जाती है। नया मॉडल इसी देरी को खत्म करना चाहता है — पहले जांच, फिर बीमारी पकड़ में आते ही इलाज। मंत्री ने साफ कहा कि 140 करोड़ की आबादी को देखते हुए स्वास्थ्य सुविधाओं को गांव स्तर तक ले जाना होगा, और यह मॉडल सिर्फ बड़े अस्पतालों पर निर्भर नहीं रहेगा।

30 साल से ऊपर हर नागरिक की स्क्रीनिंग: आरोग्य मंदिर

इस मॉडल का सबसे व्यावहारिक हिस्सा है 30 साल से ऊपर के लोगों की नियमित स्क्रीनिंग। देश भर में बने आरोग्य मंदिरों के जरिए ओरल कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर और सर्विक्स कैंसर जैसे खतरनाक कैंसरों के साथ-साथ डायबिटीज और हाइपरटेंशन की भी जांच की जा रही है। यानी एक ही जगह, एक ही बार में कई गंभीर बीमारियों का पता लगाया जा रहा है। यह पहल उन लोगों के लिए खास तौर पर अहम है जो समय पर जांच करवाने की आदत नहीं रखते। अक्सर लोग मामूली लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं, और जब तक जांच होती है, बीमारी गंभीर हो चुकी होती है। नियमित स्क्रीनिंग से यह खतरनाक देरी खत्म होगी।

आंकड़े दिखा रहे हैं स्क्रीनिंग का असर

मंत्री जेपी नड्डा ने Conclave में जो आंकड़े साझा किए, वे इस अभियान के पैमाने को दिखाते हैं। साल 2018 से अब तक हाइपरटेंशन के लिए लगभग 44 करोड़ लोगों की स्क्रीनिंग की गई, जिनमें से करीब 7.6 करोड़ लोगों में बीमारी पाई गई। डायबिटीज के लिए भी लगभग 44 करोड़ स्क्रीनिंग हुईं, जिनमें करीब 5 करोड़ मरीज मिले। कैंसर की जांच में ओरल कैंसर के लिए 37.7 करोड़ स्क्रीनिंग में लगभग 2.2 लाख मामले सामने आए, जबकि ब्रेस्ट कैंसर के लिए 17.7 करोड़ जांच में करीब 99 हज़ार और सर्विक्स कैंसर के लिए 19.8 करोड़ स्क्रीनिंग में लगभग 1 लाख मामले पकड़े गए। ये आंकड़े बताते हैं कि समय पर जांच कितनी जानें बचा सकती है — जो बीमारियां अब तक चुपचाप बढ़ रही थीं, वे अब शुरुआती दौर में ही सामने आ रही हैं।

  • हाइपरटेंशन: 2018 से अब तक ~44 करोड़ स्क्रीनिंग, ~7.6 करोड़ केस पकड़े गए
  • डायबिटीज: ~44 करोड़ स्क्रीनिंग, ~5 करोड़ मरीज मिले
  • ओरल कैंसर: 37.7 करोड़ जांच, ~2.2 लाख मामले
  • ब्रेस्ट कैंसर: 17.7 करोड़ स्क्रीनिंग, ~99 हज़ार मामले
  • सर्विक्स कैंसर: 19.8 करोड़ जांच, ~1 लाख मामले

डिजिटल ट्रैकिंग: गांव-गांव तक पहुंचेगी स्वास्थ्य सेवा

नए मॉडल का एक और मजबूत स्तंभ है डिजिटल तकनीक। बीमारी की जल्दी पहचान के लिए डिजिटल ट्रैकिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि हर मरीज के स्वास्थ्य रिकॉर्ड की समय पर निगरानी हो सके और फॉलो-अप इलाज में कोई चूक न रह जाए। मंत्री ने जोर देकर कहा कि ये सुविधाएं सिर्फ बड़े अस्पतालों तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि गांव स्तर तक पहुंचेंगी। 140 करोड़ की आबादी में कोई भी व्यक्ति सिर्फ दूरदराज के इलाके में रहने की वजह से इलाज से वंचित न रहे — डिजिटल नेटवर्क इसी लक्ष्य का मजबूत आधार बनेगा।

मां और बच्चे की सेहत पर खास फोकस

नए हेल्थ मॉडल में मां और बच्चे के स्वास्थ्य को विशेष प्राथमिकता दी गई है। मंत्री ने बताया कि जन्म से लेकर 16 साल की उम्र तक बच्चों के लिए कुल 11 टीकाकरण की व्यवस्था है, जो उन्हें कई जानलेवा बीमारियों से बचाती है। गर्भवती महिलाओं के लिए भी स्पष्ट व्यवस्था बनाई गई है — सामान्य गर्भावस्था में 5 नियमित चेकअप और 2 टीके दिए जाते हैं, जबकि हाई-रिस्क गर्भावस्था में 8 चेकअप की सुविधा मिलती है। इससे गर्भवती महिला और गर्भ में पल रहे बच्चे, दोनों की सेहत पर लगातार निगरानी रखी जा सकेगी और किसी भी जटिलता का समय पर पता चल सकेगा।

संस्थागत प्रसव में रिकॉर्ड इजाफा

स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार का असर संस्थागत प्रसव के आंकड़ों में साफ दिख रहा है। साल 2014 में जहां अस्पताल में डिलीवरी का हिस्सा करीब 78 फीसदी था, वहीं 2023-24 में यह बढ़कर 90.6 फीसदी हो गया है। यानी अब दस में से नौ से ज्यादा महिलाएं अस्पताल में ही डिलीवरी करवा रही हैं, जो मां और नवजात शिशु दोनों की सुरक्षा के लिहाज से बड़ी उपलब्धि है। साथ ही सरकार सी-सेक्शन यानी सिजेरियन डिलीवरी का पूरा खर्च खुद वहन करती है, ताकि आर्थिक तंगी की वजह से किसी महिला को सुरक्षित डिलीवरी से समझौता न करना पड़े।

इलाज से बचाव तक: बदलेगी स्वास्थ्य की तस्वीर

स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से कहते आ रहे हैं कि भारत में कई गंभीर बीमारियां देर से पकड़ में आती हैं, खासकर कैंसर। ऐसे में समय पर जांच की संस्कृति को बढ़ावा देना लाखों जानें बचा सकता है। जेपी नड्डा का यह नया हेल्थ मॉडल ठीक इसी दिशा में कदम है — सिर्फ बीमारी का इलाज नहीं, बीमारी से बचाव। अगर यह मॉडल गांव स्तर तक पूरी तरह उतरता है, तो आने वाले सालों में भारत की स्वास्थ्य तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।

About the author

राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय घटनाएं, देश-राज्य की राजनीति और सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी खबरों पर लेखन। बिजनेस और स्पोर्ट्स की खबरें भी। ब्रेकिंग न्यूज की होड़ के बीच डिजिटल मीडिया में एआई जैसे नवाचार की नर्सरी का छात्र।